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मैं लोगों के लिए हूँ .
इसका मैं कुछ नहीं कर सकता .
 
मैं  यकीन नहीं करता कि जनता जानती है
कि  उसे क्या चाहिए;
मैंने अपने करीयर से यही निष्कर्ष निकाला है .
 

कोई काम शुरू करने से पहले, स्वयम से तीन प्रश्न कीजिये
मैं ये क्यों कर रहा हूँ, इसके परिणाम क्या हो सकते हैं
और क्या मैं सफल होऊंगा.
और जब गहरई से सोचने पर इन प्रश्नों के संतोषजनक उत्तर मिल जायें,
तभी आगे बढें


व्यक्ति अकेले पैदा होता है और अकेले मर जाता है;
और वो अपने अच्छे और बुरे कर्मों का फल खुद ही भुगतता है;
और वह अकेले ही नर्क या स्वर्ग जाता है.
 
भगवान मूर्तियों में नहीं है.
आपकी अनुभूति आपका इश्वर है.
आत्मा आपका मंदिर है.

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