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गोस्वामी तुलसीदास जी के दोहे



मुखिया मुखु सो चाहिऐ खान पान कहुँ एक |
पालइ पोषइ सकल अंग तुलसी सहित बिबेक ||
अर्थ : तुलसीदास जी कहते हैं कि मुखिया मुख के समान होना चाहिए जो खाने-पीने को तो अकेला है, लेकिन विवेकपूर्वक सब अंगों का पालन-पोषण करता है |



सचिव  बैद गुरु तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस |
राज  धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास ||
अर्थ :  गोस्वामीजी कहते हैं कि मंत्री, वैद्य और गुरुये तीन यदि भय या लाभ की आशा से (हित की बात कहकर ) प्रिय बोलते हैं तो (क्रमशः ) राज्य,शरीर एवं धर्मइन तीन का शीघ्र ही नाश हो जाता है |



तुलसी मीठे बचन  ते सुख उपजत चहुँ ओर |
बसीकरन इक मंत्र है परिहरू बचन कठोर ।।
अर्थ : तुलसीदासजी कहते हैं कि मीठे वचन सब ओर सुख फैलाते हैं |किसी को भी    वश में करने का ये एक मन्त्र होते हैं इसलिए मानव को चाहिए कि कठोर वचन छोडकर मीठा बोलने का प्रयास करे |



सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि |
ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकति हानि ||
अर्थ : जो मनुष्य अपने अहित का अनुमान करके शरण में आये हुए का त्याग कर देते हैं वे क्षुद्र और पापमय होते हैं |दरअसल ,उनका तो दर्शन भी उचित नहीं होता |



दया धर्म का मूल  है पाप मूल अभिमान |
तुलसी दया  छांड़िए ,जब लग घट में प्राण ||
अर्थ: गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं कि मनुष्य को दया कभी नहीं छोड़नी चाहिए क्योंकि दया ही धर्म का मूल है और इसके विपरीत अहंकार समस्त पापों की जड़ होता है|

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